उत्तरा से इंदिरा तक….

उत्तरा से इंदिरा तक….
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वैसे तो बारिश और बर्फबारी से ठंड का माहौल है। लेकिन, सियासी पारा बहुत चढ़ा हुआ है। भगत गलती कर बैठे…। एक नहीं दो-दो। पहली ये कि वो खुद को जवां समझ बैठे…जबकि उम्र तो उनकी भी रिटायरमेंट की हो चली है। दूसरा इंदिरा हृदयेश के लिए बुरा-भला कह डाला। माफी सीधेतौर पर तो नहीं….लेकिन कह रहे हैं कि मांग ली। इस सियासी पारे का तापमान इतनी की घरों में दुबके और ठंड से सिकुड़े कांग्रेस भी सड़कों पर पुतलों से उठती लपटों पर आग सेंकते नजर आए…।

बात राजनीतिक सूचिता तक जा पहुंची…। ऐसी सुचिता जिसकी लकीरें पहले भी खींची जा चुकी हैं…। वो गुजरे जमाने की बात हो चली है और अब आने वाले वक्त की बात हो रही है। माहौल चुनावी है…। मौसम मैनेजमेंट का। समय हीरो बनने का है। चाहे दूसरा पूरी तरह जीरो ही क्यों ना हो। डैमेज कंट्रोल तो आपने सुना ही होगा…। ये ट्वीटर भी उसी मर्ज की दवा है…।

उत्तरा के प्रश्न अब भी निरुत्तर हैं…। क्योंकि वो इंदिरा नहीं थीं। सुचिता इसलिए नहीं थी, क्योंकि उसमें राजनीति नहीं थी। सियासी गर्मी का खतरा नहीं था। यहां मसला ही सियासी है। इसलिए सुचिता भी आ गई। महिला कोई भी हो, अपमान किसी का नहीं होना चाहिए। चाहे उत्तरा हों या फिर इंदिरा…।

ठीक है…पर इतना भी ठीक नहीं कि फिर कभी किसी गलत को गलत ही ना कह पाओ…। खुद की खोदी खाई को ना पाट पाओ…। यहां भी उसी सियासी खाई को पाटने की कोशिश भर की गई…। महात्मा बनना इतना आसान भी नहीं है, जितनी आसानी से लिंकों के जरिये आपके जेहन में महात्मा की तस्वीर उकेरने की कोशिश हो रही है…।

चैंपियन आज भी चैंपियन हैं…। नोटिस चलकर जाते जरूर हैं…लेकिन जब वो लौटते हैं…। उनसे पहले ही माफ हो चुके होते हैं…। अदालत के सवालों को सवाल बताने वालों को भले भी माफ ना किया गया हो…भगत जरूर माफ हो जाएंगे…। वो खुद ही सैंया हैं और कोतवाल भी…। फिर…डर काहे का…।

  •  PRADEEP RAWAT (रंवाल्टा)
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